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आख़िरी ख़्वाहिश
रात की तन्हाई में उससे सवाल करता हूँ
हर टूटी दुआ का आज हिसाब करता हूँ
सब ठीक है—ये झूठ मैं रोज़ दोहराता हूँ
ज़िंदा हूँ बस, यही ख़ुद को समझाता हूँ
लोग बदलते हैं तो बदलने दे ऐ दिल उन्हें
पर इतना बदल गए कि साँसें भी बोझ लगती हैं
जिस साथ की हर पल ख़ुदा से फ़रियाद की
वही साथ सबसे पहले जुदा हो जाता है
क्या ज़्यादा सच्चा होना कोई जुर्म ठहरा?
या दिल से निभाना ही ख़ता हो जातl है
जो माँगा दिल से, उसी को छीन लिया तूने
कभी इश्क़ गया, कभी अपना चला गया
अगर छीनना ही तेरा दस्तूर है ऐ रब
तो उम्मीद का दीपक क्यों जला गया
कोई आया न होता तो भी जी लेते हम
आदतों का ये ज़हर न पीते हम
ये आदत नहीं थी, ऐ ख़ुदा, ये प्यार था
हर दिल से बने रिश्ते का ख़याल था
तूने हर सच्चे रिश्ते को तमाशा बना दिया
मेरे प्यार को ग़लत, मुझे ही गुनहगार बना दिया
अब बस… बहुत हुआ, ये खेल छोड़ता हूँ
तेरे हर इम्तिहान से मुँह मोड़ता हूँ
जो छीनना है छीन ले, अब सवाल नहीं
मेरे आँसुओं में तुझे सुकून मिले—मलाल नहीं
बस मेरे दोस्तों को सलामत रखना
उनकी हँसी, उनकी दुआएँ अमानत रखना
मुझे कुछ नहीं चाहिए ऐ मालिक-ए-जहाँ
मैं फ़कीर ही सही, पर टूटना नहीं चाहता
अगर हो सके, मेरी सारी यादें मिटा दे
बस आख़िरी ख़्वाहिश, मेरे अपने महफ़ूज़ रख दे।