ठीक है… सब ठीक है। लोग ज़िंदा हैं, और हर ज़िंदा चीज़ बदलती है। लोग बदलते हैं— उन्हें बदलने दो। पर कितना? इतना कि आपका धैर्य टूट जाए? या इतना कि आप जीने की इच्छा ही खो बैठें? मैंने हर पल यही माँगा कि जिसका साथ न छूटे, वही साथी छूट जाता है। क्या ज़्यादा अच्छा होना ग़लत है? या यह उम्मीद रखना कि कोई छोड़े नहीं, दिल न तोड़े— क्या यह ग़लत है? समझ नहीं आता, यह कैसा खेल है जो तुम, ईश्वर, खेल रहे हो। जो-जो मैंने दिल से माँगा, वही-वही तुमने मुझसे छीन लिया। कभी इश्क़ छीना, कभी कोई अपना, और अब तुम मेरे सबसे अच्छे दोस्त भी छीन रहे हो। अगर छीनने की ही इतनी आदत है, तो देते ही क्यों हो? अगर कोई जीवन में आया ही न होता, तो भी जी लेते। खिलखिलाकर नहीं, पर जी तो लेते। हमें किसी की आदत नहीं, आदत का डर नहीं— यह प्यार है। हर पल किसी दिल से बने रिश्ते की चिंता है, ख्याल है। ईश्वर, तुमने मेरे हर दिल से बने रिश्ते का मज़ाक बना दिया। तुमने मेरे प्यार को ग़लत साबित किया, मेरे हर प्रयास को ग़लत साबित किया। अब बस… बहुत हुआ। जो छीनना है, छीन लो। मेरे हर आँसू में शायद तुम्हें आनंद आता है। मेरे हर सच्चे रिश्ते में मेरे पासेसिव होने से शायद तुम्हें मुझसे ज़्यादा डर लगता है। मैं यह खेल छोड़ रहा हूँ। अब तुम ही खेलो। बस मेरे दोस्तों का ख़याल रखना। इतना तो मेरे हर सच्चे कर्म का फल दे देना। मेरे हर दिल से बने रिश्ते की तुम रक्षा करना… उन्हें कोई दुख न पहुँचे। मुझे कुछ नहीं चाहिए। मैं फ़कीर हूँ— न कभी तुमने मुझे आशिक़ बनने दिया, न कभी किसी का साथी बनने दिया। मैं फ़कीर हूँ, और फ़कीर ही रहूँगा। हर लगाव से दूर— बस इतना ही… लो, छोड़ दिया। इसी पल छोड़ दिया। तुम बस इतना करो— मेरी सारी अच्छी-बुरी यादें मिटा दो। बस मेरे दोस्तों को महफ़ूज़ रखना, ख़ुश रखना, उन्हें बरकत देना। इतना तो तुम कर ही सकते हो… Dear God।