है कृष्ण …कैसे मैं ?
ये कैसा खेल हैं कृष्ण… यहां
कैसे मैं शुद्ध प्रेम करूं बिना किसी मोह के
कैसे मैं दोस्ती निभाऊं बिना दृढ़ विश्वास के
कैसे बुराई में भी एक अच्छाई देखूं
कैसे जागृत होकर ये बेहोशी देखूं
कैसे बदलू में भी बदलते अपनों के साथ
कैसे भूलू में भी हर अच्छी अपनों की याद
कैसे निस्वार्थी बनू इस स्वार्थ भरे संसार में
कैसे धीरज रखूं इस अधैर्य भरी धरती पे
कैसे रखूं में कदम इस माया के जाल में
कैसे रुके ये आंसू मुक्ति की इंतजार में
कैसे परखूं हाल ए दिल .. टुंटकर बिखरने का
कैसे देखूं मन का खेल ..बनने बिगड़ने का
अब बस भी करो कृष्ण …
ये खेल रचाया तेरा मैंने है अब देख लिया
करना ही नहीं था रिहा
तो ये काया जेल ही क्यों तूने बना लिया?
ये तुम्हारी झूठी कहानी , तुम ही रखो
बस सांसे गिनेंगे हम, हमसे उम्मीद ना रखो …
….कृष्ण…
🖊️ गणेश