में?

में?

में वह हूँ जो पिंजरे में रहकर भी आज़ाद है।
मैं वह हूँ जिसकी भीतर की धूनी जल चुकी है।
मैं वह बूंद हूँ जो समंदर से अलग नहीं हो सकती।
मैं वह चाँद हूँ जिसका सूरज अब खो नहीं सकता।

मैं वह हूँ जो भीतर से जाग चुका है,
मैं वह हूँ जिसने इस खेल को पहचान लिया है।

में वह हूँ
जो पिंजरे में रहकर भी आज़ाद है,
जिसे कोई दीवार, कोई ताला
अब रोक नहीं सकता।

मैं वह हूँ
जिसकी भीतर की धूनी
हर बन्धन को राख कर चुकी है,
जो अब अपने ही प्रकाश में जलता है।

मैं वह बूंद हूँ
जो समंदर से अलग नहीं हो सकती,
जिसे अपनी गहराइयों का
अब पूरा बोध हो गया है।

मैं वह चाँद हूँ
जिसका सूरज अब खो नहीं सकता,
जो हर अमावस में भी
अपनी रोशनी पहचानता है।

मैं वह हूँ
जो भीतर से जाग चुका है,
जो इस अनंत खेल की चाल समझ चुका है,
और अब केवल
स्वयं को अनुभव करने के लिए जीता है।

में वह हूँ जो पिंजरे में रहकर भी आज़ाद है।
मैं वह हूँ जिसकी भीतर की धूनी जल चुकी है।
मैं वह बूंद हूँ जो समंदर से अलग नहीं हो सकती।
मैं वह चाँद हूँ जिसका सूरज अब खो नहीं सकता।