क्या तुम्हे याद है? हमारे बीच हुए आख़िरी कड़वे झगड़े में आसमान जैसे फट पड़ा था… काले-सफेद बादलों-सी आँखों में लगातार बरस पड़ी एक मूसलधार बारिश… वह बिजली जो अचानक गिरी थी हमपर, वह बारिश इतनी जानलेवा थी कि मेरा जीना ही आँसुओं का बन गया…
तब से मुझे बारिश बिल्कुल नहीं भाती थी, पर अब वही… हाँ वैसी ही, अंधकार को चीरती, प्रचंड, सतत बरसती, बारिश देखकर मैं मुस्करा उठता हूँ— क्योंकि उसने चाँद, चाँदनी क्या? स्वयंभू सूर्य को भी बंधक बना लिया है… शायद उसके भी कुछ कारण होंगे..
हाँ, शायद उसके भी कुछ कारण होंगे … धरती से उसको अलग जो रखते है ये सब.. फिर सभी को बंधक बनाकर वो बरसता होगा, जैसे मैं तुम्हें कल्पनाओं में ही सही, बंधक बना लेता हूँ? और बरसता रहता हूं …
हम दोनों को तो बस यही आता है— भर-भर कर बरसना, बस बरसना ही… शायद?